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'बुद्ध पूर्णिमा के बहाने गेशे जम्पा की बात'

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आज बुद्ध पूर्णिमा भी है और चन्द्र ग्रहण भी। विश्व के वर्तमान हालात को भी इसी प्रतीक के माध्यम से समझ सकते हैं कि पूरे विश्व में एक वायरस ने ग्रहण लगा रखा है। जैसे ज्ञान पर माया का आवरण सदैव होता है। चन्द्र ग्रहण तो प्रकृति के नियम से छट भी जाएगा, पर माया आवरण को हटाने के लिए प्रयत्न करना होगा। इसी आवरण को भेद कर बुद्ध ने बुद्धत्व को पाया था। आज कोई भी बुद्धत्व को लालायित नहीं अपना कुछ भी त्यागने को तैयार नहीं। पर एक देश है जहां आज भी घर का एक लड़का भिक्षु बनना स्वीकारता है। वह जगह है तिब्बत। तिब्बत की बात क्यों! ये सोच रहे होंगे आप। पर मुझे लगता है आज भी सही मायने में बुद्ध की शिक्षा वहीं बसी हुई है। पर तिब्बत के हालात कुछ ऐसे हैं कि उसे बयां करना बड़े जिगर का काम है। बस एक राह सुझा सकता हूँ, यदि मंटो के 'टोबा टेक सिंह' को पढ़ सकते हैं, तो कुछ हद तक समझ जाएंगे। चीन उसपर ऐसी ज्यात्तियां बरपा रहा है, जो असहनीय हो चला है। वो तो बुद्ध के विचारों ने ही तिब्बत को इतनी शक्ति दे रखी है कि वह हिंसक प्रतिरोध न करके भी अपनी जमीन से चिपक हुआ है, नहीं तो कब का उखड़ गए होता। ये अहिंसक प्रवित्ति ...

मनुष्य सबसे क्रूर जानवर है-नीत्शे

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  Trailer   "दंश" का ग्लोबल प्रीमियर "मैवशैक" पर हुआ है! स्वीडन स्थित अंतर्राष्ट्रीय OTT (Over the Top)  Mavshack ने बनारस में बनी फिल्म "दंश" का ग्लोबल प्रीमियर किया है। बालमुकुंद त्रिपाठी द्वारा लिखित व निर्देशित फ़िल्म दंश अबतक आठ राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोहों में दिखाई जा चुकी है। आपको बताते चले फिल्म त्रिपाठी के द्वारा ही रचित नाटक "डार्क सिटी" पर आधारित है, जिसका वह दर्जनों बार मंचन कर चुके हैं। जहांतक मंच की बात यदि करें तो इस नाटक की पृष्ठभूमि से क्रूरता के रंगमंचीय सिद्धान्त के तत्व की महक आती है और नाम मे ही अंधेरे की व्याप्ति। अंधेरे के क्रूरतम परिवेश में दम घुटते लोगों की कथा विस्तार को बिम्ब देने का प्रयास दिखता है। इस फिल्म में चार अलग-अलग कहानियाँ हैं - हॉरर किलिंग, आज की राजनीति, हिन्दू-मुस्लिम, बेरोजगारी।  जिनके माध्यम से समाज में फैली विसंगतियों को प्रस्तुत किया गया है। नीत्शे की क्रूरता की परिभाषा को परिमार्जित करते हुए आर्तो की अपनी परिभाषा यह घोषणा करती है कि सभी कलाएं अनुभव के रोमांच को फिर से बनाने के लिए जीवन ...

'अभिनय के लिए सही परिभाषा नहीं ढूंढ पा रहा हूँ-श्री उर्मिल कुमार थपलियाल"

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    उर्मिल सर से जब वर्धा में मिलना हुआ  अभिनय , शब्द में जादू है। सब करना चाहते हैं। करते है। कर रहे हैं। शेक्सपियर की जुबानी कहें तो 'जीवन एक रंगमंच है और हम सभी अपनी अपनी भूमिका अदा कर रहे हैं"। कुछ लोग अभिनय करते हुए प्रसिद्ध होना चाहते है। कुछ केवल आनन्द तो कुछ इसके माध्यम से जीवन और मृत्यु के रहस्यों तक को सुलझाने का विकल्प ढूंढने में प्रयासरत हैं। अभी अभी काशी के प्रख्यात कलाविद डॉ गौतम चटर्जी ने अपने ऑफिशियल यूट्यूब चैनल में भारत के जानेमाने रंग विद्वान श्री उर्मिल कुमार थपलियाल से लिये गए साक्षात्कार का एक लघु संस्करण प्रसारित किया है। जो एक अभिनेता के लिए महत्वपूर्ण है। यूं भी सही मायने में अभिनय विषय को लेकर बहुत कम ही चर्चा-परिचर्चा होती है। क्योंकि सभी करने में दिलचस्पी रखते हैं। सुनने-समझने-सीखने में समय व्यय करना जरूरी नहीं समझते। ऐसे में इस तरह की रसद एक अभिनेता को समृद्ध करेंगी। लगभग छः मिनट के इस फ़िल्म का आरंभ श्री उर्मिल कुमार थपलियाल अपने किताबों के संग्रह से एक पुस्तक निकलते हुए - सरीखे दृश्य से होता है [जैसे सत्यजीत रे साहब की चारुलता फ़िल्म में न...

"गॉड लव्स पाइप कि बाबा को बाबा पसन्द है"

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 'मद' एक व्याभिचारी भाव है। माफ करिये ये मैं नहीं कह रहा। ये बात लगभग ढाई हजार साल पहले के एक ग्रंथ में लिखा है। जाहिर है लिखने वाला ऋषि था। ऋषि दृष्टि पवित्र होती है और गहरी भी। इसीलिए तो भाव उन्होंने उन्चास देखें, जिनमें से एक मद है। मतलब उन्चास में एक। अब इतनों में उसे कोई कितना ही समय या ध्यान देता होगा। इसीलिए उन्होंने ऋषि ने स्थाई न कह कर व्याभिचारी कि संचारी कि चारी कि जो स्थिर न हो ऐसे भावों के संग कर दिया। पर ये भाव कुछ भिन्न प्रकृति का था। समय ज्यों ज्यों बीतता गया इसने अपना स्थान स्थाई भाव में परिवर्तित करता चला गया। Cut ... यानी ठहरिए महाराज। बाबा ... यानी महादेव। आपने क्या सोचा बाबा बोले तो... जी सही ही सोचा है। पर मैंने कहा न रुकिए कि उस मुद्दे पर पुनः लौटेंगे। अभी कुछ देर 'बाबा' पर विमर्श कर लेते हैं। बाबा यानी महादेव यानी काशी विश्वनाथ जो किसी भी स्थिति में काशी को छोड़ कर नहीं रह पाते। लोग तो यहां तक कहते हैं वो आम जनों का रूप धर कर काशी का फक्कड़ जीवन का घूम घूम कर आनंद लेते है। उनके इस काशी मोह का उल्लेख किसी भी पुराण में हो तो जरा बताइयेगा कि उक्त माया...

"कही देबे सन्देस" छत्तीसगढ़ी सिनेमा का उदय चलचित्र

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  छोलीवुड का अर्थ छत्तीसगढ़ राज्य, मध्य भारत या छत्तीसगढ़ी भाषा के सिनेमा उद्योग से है । इसकी स्थापना 1965 में पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म कही देबे संधेश ("इन ब्लैक एंड व्हाइट") की रिलीज के साथ की गई थी। 1965 में मनु नायक द्वारा निर्देशित और निर्मित पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म कही देबे संदेश ("ब्लैक एंड व्हाइट") प्रदर्शित हुई। यह प्रेम की कहानी थी और कहा जाता है कि पूर्व भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने फिल्म देखी। विजय कुमार पांडे द्वारा निर्मित, 1971 में निरंजन तिवारी निर्देशित घर द्वार है। हालांकि, दोनों फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर अच्छा प्रदर्शन नहीं किया और निर्माताओं को निराश किया। उसके बाद लगभग 30 वर्षों तक किसी भी छत्तीसगढ़ी फिल्म का निर्माण नहीं हुआ ।  कही देबे संदेश 1965 की भारतीय छत्तीसगढ़ी -भाषाई फिल्म है, जिसे मनु नायक द्वारा लिखित, निर्देशित और निर्मित किया गया है। यह 1965 में रिलीज़ हुई और मध्यप्रदेश से छत्तीसगढ़ राज्य बनने से पहले ही यह पहली चॉलीवुड या छत्तीसगढ़ी फिल्म बन गई। फ़िल्म की विषयवस्तु अस्पृश्यता और जातिगत भेदभाव जैसे सामाजिक व समकालीन मुद्दों पर केंद्र...

गुजराती रंगमंच

1850 के आसपास हमें गुजराती नाटकों की प्रस्तुतियों का दौर शुरू होता दिखने लगता है। उससे पहले तक गुजरात में लोककला व लोकनाट्य भवई की परंपरा देखने को मिलती है। गुजराती नाटक को पनपने का परिवेश यूँ तो पारसी रंगमंच ने ही बनाया। जो किसी समय ईरान से आकर भारतवर्ष के पश्चिम तट पर आकर बस गए थे। मूल रूप से व्यावसायिक प्रवृत्ति होने के कारण इनका बहुत से देशों से सम्पर्क होना लाजमी था। साथ ही हर विषय में अर्थलाभ ढूंढना इनका स्वभाव बन गया था। ऐसे में ये रंगमंच को भी व्यवसाय के रूप में अपनाकर अपने अनुसार गढ़ रहे थे। ज्यादा से ज्यादा मुनाफे ले लिए अधिक से अधिक प्रदर्शन करना जारी रखते। ऐसी ही किसी टोली के हरिश्चंद्र नाटक को देख गांधी जी तक प्रभावित हो गए थे, जिसका असर इतना था कि वो अपने जीवन में सत्य' को अपनाने के लिए अडिग रहे।  फलस्वरूप 1875 में नाटक उत्तेजक मण्डली की स्थापना बम्बई में हुई। इस मण्डली ने रणछोड़ जी भाई, उदयराम, नर्मदाबाई, खुसरो कावस जी के गुजराती नाटकों का प्रदर्शन आरम्भ किया।  1865 में नगर के युवाओं ने मिलकर गुजराती रंग मंडल की नींव रख दी। वहीं 1869 में सारस्वत ब्राह्मणों ने और 1...

भारतीय सिनेमा का अनन्य कथाकार 'शरतचंद्र'

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15 सितंबर 1876 को जन्मे श्री शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय 20 वीं शताब्दी के प्रमुख बंगाली उपन्यासकार और लघु कथाकार हैं। ऐसे में हम इस विशेष कथाकार के शार्द्ध शतवर्ष जयंती मनाए जाने के द्वार पर खड़े हैं।ऐसे में उनके साहित्यिक सेवाओं के साथ फिल्मों के उत्थान में उनकी कृतियों का क्या योगदान रहा है देखें।  सिनेमा का जन्म 1895 ई में लुमियर बन्धु के सौजन्य से भले हुई हो। पर भारत में उसे चलना दादा साहब फाल्के ने सिखाया तो बोलना आर्देशिर ईरानी साहब ने। जब सिनेमा ने बोलने की कला सीख ली तो जरूरत पड़ी किस्सों-कहानियों की। ऐसे में न्यू थिएटर के प्रमथेश बरुआ साहब ने जिस कथाकार की लंबी कहानी चुनी, वो थे भारत के अमर कथाकार श्री शरतचंद्र चट्टोपाध्याय। जिनकी कहानियां जैसे भारतीय सिनेमा के लिए वरदान हो। 'बिराज बहु", "मंझली दीदी", "वैंकुठेर विल (वैंकुठ का वसीयतनामा) पर 1962 में राष्ट्रपति सम्मानित फ़िल्म 'सौतेला भाई' का निर्माण हुआ। उनके उपन्यास "परिणीता" पर उसी नाम से दो बार फ़िल्म बानी।  इन कहानियों, उपन्यासों से ये बात तो सामने आ ही जाती है कि मानव मन विशेषतः स्त्री मन ...