गुजराती रंगमंच
1850 के आसपास हमें गुजराती नाटकों की प्रस्तुतियों का दौर शुरू होता दिखने लगता है। उससे पहले तक गुजरात में लोककला व लोकनाट्य भवई की परंपरा देखने को मिलती है। गुजराती नाटक को पनपने का परिवेश यूँ तो पारसी रंगमंच ने ही बनाया। जो किसी समय ईरान से आकर भारतवर्ष के पश्चिम तट पर आकर बस गए थे। मूल रूप से व्यावसायिक प्रवृत्ति होने के कारण इनका बहुत से देशों से सम्पर्क होना लाजमी था। साथ ही हर विषय में अर्थलाभ ढूंढना इनका स्वभाव बन गया था। ऐसे में ये रंगमंच को भी व्यवसाय के रूप में अपनाकर अपने अनुसार गढ़ रहे थे। ज्यादा से ज्यादा मुनाफे ले लिए अधिक से अधिक प्रदर्शन करना जारी रखते। ऐसी ही किसी टोली के हरिश्चंद्र नाटक को देख गांधी जी तक प्रभावित हो गए थे, जिसका असर इतना था कि वो अपने जीवन में सत्य' को अपनाने के लिए अडिग रहे।
फलस्वरूप 1875 में नाटक उत्तेजक मण्डली की स्थापना बम्बई में हुई। इस मण्डली ने रणछोड़ जी भाई, उदयराम, नर्मदाबाई, खुसरो कावस जी के गुजराती नाटकों का प्रदर्शन आरम्भ किया।
1865 में नगर के युवाओं ने मिलकर गुजराती रंग मंडल की नींव रख दी। वहीं 1869 में सारस्वत ब्राह्मणों ने और 1875 में लुहाणा गृहस्थों के लड़कों ने जूनागढ़ में अव्यावसायिक गुजराती नाटक मंडलियां कार्य करना आरम्भ कर दी थी।
व्यवसाय प्रवृत्ति होने पर भी पारसी रंगमंच ने एक आकर्षण तो गुजरात के युवाओं में बना ही दिया था। एक कारण ये भी हुआ कि पारसी रंगमंच ने अपनी शैली को बरकरार रखते हुए, स्थानीय भाषा गुजराती में सम्वाद बोलने की प्रथा को विकसित कर लिया। मतलब पारसी रंगमंच ने आरम्भ में अपने नाटकों में गुजराती को प्रश्रय दिया यूँ कहें गुजराती रंगमंच का बाल्यकाल उसी के संरक्षण में गुजरा। पर आजीवन उसकी उंगली न थामकर धीरे धीरे गुजराती रंगमंच उससे स्वतंत्र हो अपना विशेष रूप विकसित करने में कामयाब रहा।
1843 में मराठी रंगमंच के उदय ने भी गुजराती रंगमंच को स्वावलंबी बनने में प्रेरणा स्रोत बना। मराठी रंग मंडलियों ने भी गुजराती रंगमंच को प्रेरित और प्रभावित करने में अग्रणी रही। मराठी की रंग मंडलियां अपनी प्रस्तुतियों को लेकर सौराष्ट्र में प्रदर्शन के लिए जाया करती थी। उनके खेलों को देखकर गुजराती युवा वर्ग प्रेरणा पाकर रंग मंडल बनाने को तटपर हुए और आगे चलकर उन्होंने उसमे सफलता भी पाई।
नाटककार रणछोड़ भाई उदयराम को गुजराती रंगमंच का प्रवर्तक माना जाता है।
आरम्भिक दौर की बात करें तो गुजराती नाटककार श्री दलपत राम द्वारा रचित नाटकों का प्रदर्शन सन 1873 में बम्बई की पारसी-गुजराती मण्डली और एलिफिस्टन नाटक मण्डली द्वारा मंचित हुए। यूँ तो ये नाटक मंडलियां अधिकतर हिंदी उर्दू नाटकों को खेलने में वरीयता देती थी। इन मंडलियों द्वारा इक्क दुक्का प्रदर्शन गुजराती नाटकों को देख, गुजराती नाटककारों और निर्देशकों को और भी गुजराती रंग मंडलियों की आवश्यकता महसूस होने लगी।
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