"गॉड लव्स पाइप कि बाबा को बाबा पसन्द है"


 'मद' एक व्याभिचारी भाव है। माफ करिये ये मैं नहीं कह रहा। ये बात लगभग ढाई हजार साल पहले के एक ग्रंथ में लिखा है। जाहिर है लिखने वाला ऋषि था। ऋषि दृष्टि पवित्र होती है और गहरी भी। इसीलिए तो भाव उन्होंने उन्चास देखें, जिनमें से एक मद है। मतलब उन्चास में एक। अब इतनों में उसे कोई कितना ही समय या ध्यान देता होगा। इसीलिए उन्होंने ऋषि ने स्थाई न कह कर व्याभिचारी कि संचारी कि चारी कि जो स्थिर न हो ऐसे भावों के संग कर दिया। पर ये भाव कुछ भिन्न प्रकृति का था। समय ज्यों ज्यों बीतता गया इसने अपना स्थान स्थाई भाव में परिवर्तित करता चला गया।

Cut ... यानी ठहरिए महाराज।

बाबा ... यानी महादेव। आपने क्या सोचा बाबा बोले तो... जी सही ही सोचा है। पर मैंने कहा न रुकिए कि उस मुद्दे पर पुनः लौटेंगे। अभी कुछ देर 'बाबा' पर विमर्श कर लेते हैं। बाबा यानी महादेव यानी काशी विश्वनाथ जो किसी भी स्थिति में काशी को छोड़ कर नहीं रह पाते। लोग तो यहां तक कहते हैं वो आम जनों का रूप धर कर काशी का फक्कड़ जीवन का घूम घूम कर आनंद लेते है। उनके इस काशी मोह का उल्लेख किसी भी पुराण में हो तो जरा बताइयेगा कि उक्त माया-मोह-मद कब, क्यों, कहाँ, कैसे या किस प्रकार पड़ा।

Cut to ... God Loves Pipe

 एक शॉट से आरंभ हुई सिनेमा की यात्रा समय के साथ जब लघु फिल्मों उन्नत होकर पूर्ण दैर्घ्य की हुई तो लघु फिल्मों को महत्व देना कम हो गया। पर समय बदला सिनेमा का पर्दा क्रमशः संकीर्ण होते होते जब मुट्ठी में आ फसा तब लघु फिल्मों के दिन फिर गए। आज लघु फिल्मों ने अपना दमखम दिखना आरम्भ कर दिया है। उनकी जुबान में वो गीत बैठ गया है-छोटा ... जान के हमकों ना ... रे, ना धिन, धिन ना, ना धिन, धिन ना नाच नचा देंगे।

Flash back ... लौटे, मोक्ष की ओर

मोक्ष एक दार्शनिक शब्द है। शास्त्रों और पुराणों के अनुसार जीव का जन्म और मरण के बन्धन से छूट जाना ही मोक्ष है। इसे 'विमोक्ष', 'विमुक्ति' और 'मुक्ति' भी कहा जाता है। भारतीय दर्शनों में कहा गया है कि जीव अज्ञान के कारण ही बार बार जन्म लेता और मरता है । इस जन्ममरण के बंधन से छूट जाने का ही नाम मोक्ष है। जब मनुष्य मोक्ष प्राप्त कर लेता है, तब फिर उसे इस संसार में आकर जन्म लेने की आवश्यकता नहीं होती

Film Trailer 

ऊपरोक्त बातों की चर्चा करना जरूरी था। इसलिए किया। अब उस फ़िल्म की बात करेंगे जिसके लिए इतना कुछ कहना पड़ा। यूं तो विश्व में कई हजार फिल्में बन रही है और बनती ही रहेगी। पर समय गुजरेगा तो कुछ एक ही जेहन में अंकित रह जाएंगी। उसका कारण - फ़िल्म का कंटेंट, ट्रीटमेन्ट और एक्टिंग।

कंटेंट : फ़िल्म का कंटेंट सर्वकालिक है। आदमी जब तक रहेगा तबतक किसी न किसी मद में यानी घोर में जीता रहेगा और मन में मोक्ष की तृष्णा से छटपटाता रहेगा। मृत्यु के बाद भी छुटकारा सम्भव नहीं। कंटेंट को विस्तार देने के लिए एक अदद कथा की जरूरत होती तो कथा संछेप में इतनी ही है कि दो दोस्त मोक्ष की चाह में भटक रहे हैं। हां साहब मरणोपरांत। मृत्यु कैसे हुई ! ये मुद्दा जरूरी नहीं। मौत कैसे भी किसी भी रूप में आ सकती है। एक कोरोना ही काफी नहीं क्या। हां तो दोनों मोक्ष के लिए अपने इष्ट यानी देव आदि देव महादेव को ढूंढ रहे कि वो ही कुछ जुगाड़ लगा सकते हैं। दोनों पहुंच भी जाते हैं। बाबा की बातों और फटकार से उनके अंधविश्वास की परतें हट जाती हैं। दिलचस्प है कि अब उन्हें मोक्ष की भी जरूरत नहीं रही। एक बार गोरक्षनाथ को उनके सिद्धि प्राप्ति के सम्बंध में पूछा कि हे नाथ अब तो आप सिद्धहस्त हो गए, इसके बाद क्या करेंगें? सौम्यता से गुरु ने कहा-हसीबा, खेलिबा, करिबा काज।

ट्रीटमेंट : गूढ़ बात को गूढ़ तरीके से वैदिक साहित्य में कहे जाने की एक लंबी परंपरा जम्बूद्वीप में थी। साथ ही एक खास वर्ग के अधीन यह परंपरा संचालित होती रही। तब तक चार वेद, उपनिषद, पुराण, रामायण, महाभारत तक अस्तित्व में आ गया था। पर लोगों में सम्यक ज्ञान का प्रवाह क्षीण होता जा रहा था। ऐसे में एक ऐसे क्रिड़नीय यानी खेल की आवश्यकता महसूस की जाने लगी जिससे आम जन को उसके माध्यम से शिक्षित किया जा सके उचित सन्देश पहुँचाया जा सके। पर उसकी भी एक पद्धतिबद्ध पद्धति होना जरूरी था। भार एक ऋषि को मिला। शिल्प या कला की इनसाक्लोपीडिया हमारे हाथ लगी। वैसे तो उसमें छ हजार दिशा निर्देश हैं कला को ट्रीट करने के। पर अभिषेक ने एकदम सटीक ट्रीटमेंट दिया "रूपक" को अपने फ़िल्म का आधार बनाकर कि गंभीर बात को व्यंग्यात्मक हास्य की राह से मंजिल तक पहुंचाया।

एक्टिंग : बनारस के अभिनेताओं में चार चर्चित अभिनेताओं ने इसमें अपने अनुभव के जोर पर अपने अपने किरदारों को जिया है। कहना होगा छक कर मजा लिया है। फ़िल्म में अभिनय का मतलब अभिनय न करना। सहज ही सब घटने देना, खुद बस साक्षी होना उस पल का। और सक्रिय अदा करते जाना कि ईश्वर ने वो जीवन आपको जीने का मौका दिया जो किसी आम जन के अधिकार में नहीं होता। वो बस अपने ही जीवन के हर्षों-संघर्षों में सिमटा रहता है। पर एक अभिनेता एकाधिक जीवन जीता है, एक ही जीवन में कई कई जीवन जी लेता है। अभिनेता के रूप में बालमुकुंद त्रिपाठी, नवीन चन्द्रा, उमेश भाटिया को देखना एक अलग एहसास इस फ़िल्म में होता है। इन्होंने अपने अपने कम्फर्ट ज़ोन से निकलकर बेहद अलग किरदार को जिया है। जो उनके लिए और दर्शकों के लिए नए उपहार प्राप्ति की तरह है। एक अभिनेता के दो ही शस्त्र होते हैं अपनी कला प्रतिभा सामने लाने के लिए। उनमें से किसी एक को जब विराम देना पड़ जाए तो कलाकार को अधिक जोर लगाना पड़ता है। इस बात को वो समझ सकते है जिनको ऐसा करना पड़ा हो। सविता यादव ने कम समय में ही बनारस में अपनी प्रतिभा से सभी को मोहित किया है। इस फ़िल्म में वो दिखती नहीं बस उनकी आवाज सुनाई देती है। जो एक सधे हुए कलाकार की तरह दर्शकों के सामने अपने स्वर से ही अपने होने का एहसास करा देती है। भरोसा न हो एक बार फ़िल्म देख लीजिए महाराज!

फ़िल्म के अंत तक आते आते ये फील हो जाता है कि मद हो तो मोक्ष सम्भव नहीं। मोक्ष की चाह हो तो मद को विसर्जित करना ही होगा। निर्देशक ने प्रतीक के तौर पर अंगुठियों को नदी में बहा कर दर्शाया है। पर महादेव को मोक्ष मिलना कठिन है कि उन्हें काशी के मद ने जकड़ रखा है। क्या करें काशी नगरी है ही कुछ ऐसी, इसे ऊपर से नहीं दिल से जिया जाता है।

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