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"कही देबे सन्देस" छत्तीसगढ़ी सिनेमा का उदय चलचित्र

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  छोलीवुड का अर्थ छत्तीसगढ़ राज्य, मध्य भारत या छत्तीसगढ़ी भाषा के सिनेमा उद्योग से है । इसकी स्थापना 1965 में पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म कही देबे संधेश ("इन ब्लैक एंड व्हाइट") की रिलीज के साथ की गई थी। 1965 में मनु नायक द्वारा निर्देशित और निर्मित पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म कही देबे संदेश ("ब्लैक एंड व्हाइट") प्रदर्शित हुई। यह प्रेम की कहानी थी और कहा जाता है कि पूर्व भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने फिल्म देखी। विजय कुमार पांडे द्वारा निर्मित, 1971 में निरंजन तिवारी निर्देशित घर द्वार है। हालांकि, दोनों फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर अच्छा प्रदर्शन नहीं किया और निर्माताओं को निराश किया। उसके बाद लगभग 30 वर्षों तक किसी भी छत्तीसगढ़ी फिल्म का निर्माण नहीं हुआ ।  कही देबे संदेश 1965 की भारतीय छत्तीसगढ़ी -भाषाई फिल्म है, जिसे मनु नायक द्वारा लिखित, निर्देशित और निर्मित किया गया है। यह 1965 में रिलीज़ हुई और मध्यप्रदेश से छत्तीसगढ़ राज्य बनने से पहले ही यह पहली चॉलीवुड या छत्तीसगढ़ी फिल्म बन गई। फ़िल्म की विषयवस्तु अस्पृश्यता और जातिगत भेदभाव जैसे सामाजिक व समकालीन मुद्दों पर केंद्र...

गुजराती रंगमंच

1850 के आसपास हमें गुजराती नाटकों की प्रस्तुतियों का दौर शुरू होता दिखने लगता है। उससे पहले तक गुजरात में लोककला व लोकनाट्य भवई की परंपरा देखने को मिलती है। गुजराती नाटक को पनपने का परिवेश यूँ तो पारसी रंगमंच ने ही बनाया। जो किसी समय ईरान से आकर भारतवर्ष के पश्चिम तट पर आकर बस गए थे। मूल रूप से व्यावसायिक प्रवृत्ति होने के कारण इनका बहुत से देशों से सम्पर्क होना लाजमी था। साथ ही हर विषय में अर्थलाभ ढूंढना इनका स्वभाव बन गया था। ऐसे में ये रंगमंच को भी व्यवसाय के रूप में अपनाकर अपने अनुसार गढ़ रहे थे। ज्यादा से ज्यादा मुनाफे ले लिए अधिक से अधिक प्रदर्शन करना जारी रखते। ऐसी ही किसी टोली के हरिश्चंद्र नाटक को देख गांधी जी तक प्रभावित हो गए थे, जिसका असर इतना था कि वो अपने जीवन में सत्य' को अपनाने के लिए अडिग रहे।  फलस्वरूप 1875 में नाटक उत्तेजक मण्डली की स्थापना बम्बई में हुई। इस मण्डली ने रणछोड़ जी भाई, उदयराम, नर्मदाबाई, खुसरो कावस जी के गुजराती नाटकों का प्रदर्शन आरम्भ किया।  1865 में नगर के युवाओं ने मिलकर गुजराती रंग मंडल की नींव रख दी। वहीं 1869 में सारस्वत ब्राह्मणों ने और 1...

भारतीय सिनेमा का अनन्य कथाकार 'शरतचंद्र'

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15 सितंबर 1876 को जन्मे श्री शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय 20 वीं शताब्दी के प्रमुख बंगाली उपन्यासकार और लघु कथाकार हैं। ऐसे में हम इस विशेष कथाकार के शार्द्ध शतवर्ष जयंती मनाए जाने के द्वार पर खड़े हैं।ऐसे में उनके साहित्यिक सेवाओं के साथ फिल्मों के उत्थान में उनकी कृतियों का क्या योगदान रहा है देखें।  सिनेमा का जन्म 1895 ई में लुमियर बन्धु के सौजन्य से भले हुई हो। पर भारत में उसे चलना दादा साहब फाल्के ने सिखाया तो बोलना आर्देशिर ईरानी साहब ने। जब सिनेमा ने बोलने की कला सीख ली तो जरूरत पड़ी किस्सों-कहानियों की। ऐसे में न्यू थिएटर के प्रमथेश बरुआ साहब ने जिस कथाकार की लंबी कहानी चुनी, वो थे भारत के अमर कथाकार श्री शरतचंद्र चट्टोपाध्याय। जिनकी कहानियां जैसे भारतीय सिनेमा के लिए वरदान हो। 'बिराज बहु", "मंझली दीदी", "वैंकुठेर विल (वैंकुठ का वसीयतनामा) पर 1962 में राष्ट्रपति सम्मानित फ़िल्म 'सौतेला भाई' का निर्माण हुआ। उनके उपन्यास "परिणीता" पर उसी नाम से दो बार फ़िल्म बानी।  इन कहानियों, उपन्यासों से ये बात तो सामने आ ही जाती है कि मानव मन विशेषतः स्त्री मन ...

फर्स्ट पर्सन - ऋतुपर्णो घोष

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 "पहली बार किसने बातें करना सिखाया था, याद नहीं। काले रंग के ऊपर लाल रंग से पंक्षियों की आकृतियां बनी हुई घर पर एक बेडकवर रहा करती थी। उसे देख पहले पहल पंक्षी पहचानना सीखा। तब पंक्षी नहीं कह पाता था। कहता था 'कपि'। पहला गीत सिखाया मौसी ने। 'आलो आमार आलो ओगो' नहलाने से पहले तेल मलते मलते। 'पॉथेर पाचाली' पहली दफा खरीदकर दी बुआ ने। तब बुआ की शादी भी न हुई थी। पिताजी की सबसे छोटी बहन श्याम वर्ण, बालों की चोटी मोटी। अपु-दुर्गा की कहानी को पढ़कर लगा, बुआ मेरी दीदी होती तो अच्छा होता। फाउंटेन पेन से लिखना पहली बार पिताजी ने सीखाया। महाभारत पढ़ने की विधि भी। राजशेखर बसु की महाभारत।  शाम को अपने होमवर्क निपटा कर हम तीन लोग बैठ जाते।  बाबा पढ़ते।  दादी अम्मा और मैं सुनता। बाबा ने ही बताया था कि कैसे अजायबघर को देखा जाता है। उत्तरभारतीय मंदिरों से दक्षिणभारतीय मंदिरों के फर्क को समझाया था। उन्होंने ही बताया था U के बगैर Q अक्षर से अंग्रेजी शब्द निर्मित नहीं होता।   बताया था अंग्रेजी वर्णों को दरअसल रोमन कहा जाता है। माँ को गाना नहीं आता था। इसलिए 'संचयिता' पढ़कर म...

चुनिबाला देवी : पॉथेर पांचाली की इंदिर ठाकुरुन

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  बकौल सत्यजीत रे - जिसप्रकार महानायक उत्तम कुमार के उपलब्ध न होने पर "नायक" फ़िल्म को बनाते ही नहीं उसीप्रकार चुनिबाला देवी के न मिलने पर "पॉथेर पाचाली ( राह का गीत )" बनाना सम्भव ही नहीं हो पाता। सत्यजीत रे साहब की एक खोज ही कही जाएगी अभिनेत्री चुनिबाला देवी। रे साहब की "पॉथेर पांचाली" फ़िल्म का चरित्र विशेष इंदिर ठाकुरुन भूमिका को निभाने वाली अभिनेत्री "चुनिबाला देवी" एक अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त पहली भारतीय अभिनेत्री हैं। जिसकी खबर सम्भवतः हममें से गिने चुने लोगों को ही ज्ञात होगी! विदुषी चुनिबाला देवी की उन अनजान बातों पर चर्चा करना बहुुुत जरूरी है।  बात उस समय की है जब सत्यजीत रे साहब ने "पॉथेर पांचाली" फ़िल्म के लिए हरिहर, सर्बजया, अपु, दुर्गा आदि तमाम चरित्रों के लिए अभिनेता / अभिनेत्रियों के निर्धारण कर चुके थे लेकिन इंदिर ठाकुरुन चरित्र के लिए जिस प्रकार की अभिनेत्री की आवश्यकता है, वो मिल ही नहीं रही। चरित्रानुरूप कद काठी की एक वृद्धा अभिनेत्री के न मिल पाने पर इस फ़िल्म का निर्माण सम्भव ही नहीं। करे तो करे क्या! उस किरदार के...

"सुनील दत्त" भारतीय सिनेमा में एक विशिष्ठ स्थान रखने वाले कलाकार

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"सुनील दत्त" भारतीय सिनेमा में एक विशिष्ठ स्थान रखने वाले कलाकार सुनील दत्त साहब का आज जन्मदिन है। उनको याद करते हुए ..... 1955 में भारत मे प्रदर्शित सैगल प्रोडक्शन के बैनर तले बनने वाली फिल्म थी रेल्वे प्लैटफॉर्म। यूं तो फ़िल्म की चिरपुरातन कथा अमीरी-गरीबी थी। फिर भी कई मायनो में उस समय के मद्दे नजर आधुनिक कही जा सकती है।त्रिकोणी प्रेम कथा में एक राजकुमारी का दिल एक गरीब आदमी पर आ जाता है। कथा रमेशसैगल की लिखी हुई है। सैगल साहब ने निर्देशन भी किया। फ़िल्म के आरम्भ में ही जहां टाइटल और क्रेडिट के संग रेल की पटरी के गुजरते जाने से होता है। इस प्रकार का यह सम्भवतः भारत का पहला दृश्य है। रेलवे ट्रैक के ऊपर चलता ट्रेन सभी चीजों को पीछे छोड़ती हुई बढ़ रही है। कैमरे को ट्रेन के एकदम आखिर में टिका कर फिल्मांकन किया गया है। कैमेरा निर्देशन द्रोणाचार्य जी का था। जो पहलीबार में ही दर्शकों में कौतूहल और आश्चर्य का संचार करता है। उक्त दृश्य का प्रभाव भारतीय सिनेमा पर इतना रहा कि उसके बाद बहुत से फिल्मकारों ने उसे दोहराया। यहां तक कि भारतीय सिनेमा के महान निर्देशकों में से एक मृ...

प्रसंग : मिनर्वा थियेटर, कोलकाता

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'मिनर्वा' नाम से पश्चिम बंगाल के कोलकाता शहर में एक नाट्यगृह है। इस हॉल के आरम्भिक दौर में बंगाल के नाट्यविद गिरीश घोष, अमृत बसु, अर्धेन्दू शेखर मुस्तफी जैसे बड़े कलकोरों का जमावड़ा रहता था। नोटी बिनोदिनी के प्रयास से बनी स्टार थियेटर की प्रस्तुतयों से बड़ी प्रतिस्पर्धा रहती। एक बार स्टार थियेटर में चल रहे #द्विजेन्द्र लाल राय के नाटक को मिनर्वा के कलकोरों ने मात्र 5 दिन के अभ्यास पर उतार दिया। दोनो हॉल में एक ही नाटक चलने पर भी दर्शक का जमावड़ा किसी में कम न हुआ। किसी किसी ने दोनों हाल की प्रस्तुति को इसी उत्साह से देखा कि ये क्या करते हैं। नाट्य सम्राट गिरीश चन्द्र घोष की एक काव्य रचना 'हल्दीघाटी का युद्ध' है। एक समय था जब सबकी जुबान पर ये उसी तरह से चढ़ा हुआ था, जिस प्रकार से हरिवंश राय बच्चन जी की 'मधुशाला'। स्टार थियेटर के सुयोग्य अध्यक्ष नाट्याचार्य अमृत बाबू, राणाप्रताप नाटक में गिरीश बाबू के उक्त कविता को विभिन्न पत्रों द्वारा युद्ध के वर्णन को व्यक्त करने के उद्देश्य से प्रयोग कर दिया। फिर क्या था, पहली प्रस्तुति होते ही नाट्य रचनाकार द्विजेन्द्र लाल र...