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1980-90 दशक की फिल्में और उनका गीत संगीत

1980-90 दशक की फिल्में और उनका गीत संगीत संग्रह और सम्पादन जयदेव दास 1980 --------- द बर्निंग ट्रेन रेलवे इंजीनियर, विनोद, भारत की सबसे तेज़ यात्री ट्रेन, सुपर एक्सप्रेस को हरी झंडी देता है। लेकिन उसका प्रतिद्वंद्वी, ट्रेन में बम लगा देता है और विस्फोट के कारण ट्रेन को रोकना मुश्किल हो जाता है। रिलीज़ दिनांक: 20 मार्च 1980 (भारत) निर्देशक: रवि चोपड़ा संगीत: राहुल देव बर्मन पल दो पल का साथ हमारा मोहम्मद रफ़ी, आशा भोसले वादा है वादा किशोर कुमार, आशा भोसले मेरी नजर है तुझ पे आशा भोसले पहली नजर में हमने अपना दिल किशोर कुमार, मोहम्मद रफ़ी, आशा भोसले, ... किसी के वादे पे क्यों ऐतबार आशा भोसले तेरी है जमीन, तेरा आसमान पद्मिनी कोल्हापुरे, पूर्णिमा कर्ज मोंटी को अपने पिछले जीवन के बारे में चौंकाने वाला सच पता चलता है कि उसकी पैसा ऐंठने वाली बीवी ने ही उसकी हत्या की थी और उसके परिवार को बेघर कर दिया था। वह चीजें सही करने का फैसला करता है। रिलीज़ दिनांक: 11 जून 1980 (भारत) निर्देशक: सुभाष घई संगीतकार: प्यारेलाल रामप्रसाद शर्मा एक हसीना थी किशोर कुमार कमाल...

पद्मश्री निरंजन गोस्वामी

**पद्मश्री निरंजन गोस्वामी** मूक अभिनय के शलाखा पुरुष के अनुभवों को महाराष्ट्र की संस्था ब्लैक सॉइल ने संजोया है। अभी अभी उसका 'प्रोमो' जारी किया गया। जिसमें निरंजन दादा अपने अनुभवों की झोली से एक एक मोती निकलते दिख रहे हैं। इस साक्षात्कार निर्माण का निर्देशन डॉ सुरभि बिप्लव ने कुशलता से किया है। सिनेमेटोग्राफर राजदीप जी ने इसके छायांकन का भार ही नहीं वहन किया अपितु जटिल तकनीकी पक्ष को भी निखारा है। कुछ ही दिनों में पूरी कृति सबके सामने होगी। हम आशान्वित व प्रतीक्षारत हैं। निरंजनगोस्वामी निरंजन गोस्वामी भारतीय माइम कलाकार और मंच निर्देशक हैं, जिन्हें भारत में माइम कला रूप को आगे बढ़ाने का श्रेय दिया जाता है । वह इंडियन माइम थिएटर के संस्थापक हैं , जो एक समूह है, जो 'मूक अभिनय" की कला को बढ़ावा देता है । उन्होंने अपने करियर की शुरुआत 1960 के दशक के अंत में बहुरूपी के साथ की थी, जो बंगाल की स्थानीय थिएटर ग्रुप है, लेकिन बाद में रवीन्द्र भारती विश्वविद्यालय से थिएटर कोर्स में शामिल हुए। उन्होंने माइम को बढ़ावा देने के लिए इंडियन माइम थिएटर की स्थापना की तथा भार...

film editing

आज हम #फ़िल्म सम्पादन में '#निरंतरता' बनाये रखने को समझेंगे। उदाहरण के लिए हमने #अजयदेवगन अभिनीत व #स्वास्थ्य_विभाग_भारत_सरकार द्वारा निर्मित #लघुचित्र '#आरोग्यसेतु' की मदद ली है (वर्तमान समय में जिस महामारी से हम जूझ रहें हैं, उससे लड़ने के लिए यह एप कारगर साबित होगा)। जिसमें देवगन साहब ने दोहरी #भूमिका का निर्वहन किया है।  फ़िल्म की निरंतरता को बनाये रखने के लिए इस फ़िल्म में जिन व्याकरणों को ध्यान में रखा गया है, उन पर हम आज चर्चा करेंगे। सम्पादन में निरंतरता बनाए रखने के लिए #सम्पादक को दो शॉट्स को जोड़ना या काटना इस प्रकार से होता है कि दर्शकों का ध्यान भंग न हो। कथाचित्र को वो बिना किसी बिघ्न बाधा के सिर्फ देखे ही नहीं उसमें लीन होता जाए कि कथा के संग बहता जाए कि वह नैसर्गिक लगे। कोई जर्क न हो। यही निरन्तरता का #तत्व है। यशार्थ मंजुल सर (Yasharth Manjul) ने अपनी बात को आगे बढाते हुए कहा कि फ़िल्म तकनीक में 'निरन्तरता सम्पादन continuity editing' कोई #सिद्धांत नहीं बल्कि एक #व्याकरण है। उक्त लघु चित्र में भी इस व्याकरण का प्रयोग बखूबी दिखता है। Conti...

कृतियों पर आधारित हिंदी फिल्में

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आज शेक्सपियर पुण्यतिथि है ************************** उनकी कृतियों पर आधारित हिंदी फिल्में मकबूल (2004) --------- अंडरवर्ल्ड डॉन के एक वफादार गुर्गे, मकबूल को अपने बॉस की प्रेमिका, निम्मी से प्यार हो जाता है। निम्मी, मक़बूल को, डॉन को मारकर अगला डॉन बनने के लिए उकसाती है। रिलीज़ दिनांक: 30 जनवरी 2004 (भारत) निर्देशक: विशाल भारद्वाज मुख्य कलाकार: पंकज कपूर, तब्बू व इरफ़ान खान पुरस्कार: राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार - सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता, ज़्यादा संगीतकार से फिल्मकार बने विशाल भारद्वाज के अनुसार उनकी फिल्म मकबूल मानवीय रिश्तों की कहानी है और अंडरवर्ल्ड केवल कथानक की पृष्ठिभूमि के रूप में है। श्री भारद्वाज ने इनकार किया कि उन्होंने 'गॉडफादर' या अन्य किसी फिल्म की नकल करने का प्रयास किया है। उन्होंने कहा कि अंडरवर्ल्ड ने हमेशा उन्हें अचंभित किया है और वह एक ऐसी फिल्म बनाना चाहते थे जिसमें अंडरवर्ल्ड की पृष्ठिभूमि हो लेकिन नाटकीय हो इसीलिए उन्होंने मैकबेथ नाटक का कथानक उठाया। श्री भारद्वाज ने कहा कि मूल कहानी वही है लेकिन इसमें थोड़ा सा बदलाव किया है। शेक्सपियर की ...

हिंदी रंगमंच दिवस और यथार्थ

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आज चैत्र शुक्ल ११ संवत २०७७ है अतः हिंदी पंचांग के अनुसार हिंदी का पहला मंचित नाटक शीतला प्रसाद कृत नाटक 'जानकी मंगल' की प्रस्तुति १५२ वर्ष पहले बाबू ऐश्वर्य नारायण सिंह के प्रयत्न से 'बनारस थिएटर' में बड़ी धूम धाम से खेला गया। वहीं पहला हिंदी नाटक 'नहुष' (जो भारतेंदु जी के पिता जी ने लिखी है) को मानते हैं। बाबू भारतेंदु हरिश्चंद्र ने प्रेक्षालय का नाम तो दिया पर वह बनारस के किस स्थान पर स्थित था उल्लेख नहीं किया। जिस समय वह ये लेख लिख रहे होंगे तब 'बनारस थिएटर' इतना जाना पहचाना नाम था कि उसके नाम का उल्लेख होते ही लोग उसका अनुमान उसी प्रकार से लगा लेते होंगे, जिस प्रकार आज बनारस के हर रँगप्रेमी 'श्री नागरी नाटक मण्डली' कहते ही कबीर चौराहा के पिपलानी कटरा के समीप के स्थान विशेष को ही जानता है। पर मजे की बात यह है कि यह नाम एक रंग मण्डली का है जिसकी स्थापना 1909 ईसवी में हुई। पर वहां स्थित प्रक्षागृह का असली नाम 'मुरारीलाल मेहता प्रक्षागृह (1960) है, जो उतना प्रचलित नहीं। अब कुछ लोग यह दावा करते हैं कि बनारस के केंटोनमेंट क्षेत्र मे...

मोरा गोरा रंग लई ले

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  बन्दिनी १९६३ में बनी हिन्दी भाषा की फिल्म है जिसके निर्माता और निर्देशक बिमल रॉय थे जिन्होंने दो बीघा ज़मीन और मधुमती जैसी प्रतिष्ठित फ़िल्में बनायीं थीं। इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे अशोक कुमार, धर्मेन्द्र और नूतन। बॉक्स ऑफ़िस में इस फ़िल्म ने ठीक ठाक ही प्रदर्शन किया था। फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कारों में इसे उस वर्ष छ: पुरस्कारों से नवाज़ा गया था जिसमें फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म पुरस्कार भी शामिल था। यह फ़िल्म एक नारी प्रधान फ़िल्म है, जो कि हिन्दी फ़िल्मों में कम ही देखने को मिलता है। सुजाता के बाद बिमल रॉय की यह दूसरी नारी प्रधान फ़िल्म थी। बंदिनी की कहानी कल्यानी (नूतन) के इर्द-गिर्द घूमती है। यह शायद अकेली ऐसी फ़िल्म है जिसमें भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में गांव की साधारण महिलाओं का योगदान दर्शाया गया हो।  इस फ़िल्म के संगीतकार सचिन देव बर्मन हैं तथा गीतकार शैलेन्द्र और गुलज़ार हैं।  फ़िल्म में पार्श्व संगीत का भार राहुल देव बर्मन ने सम्हाला  गीतकार के रूप में यह गुलज़ार की पहली फ़िल्म थी। उन्होंने इस फ़िल्म के लिए मोरा गोरा रंग लई ले लिखा है। साथ ही सहा...

आंगिकाभिनय

आंगिकाभिनय सर्वे हस्तप्रचाराश्च प्रयोगेषु यथाविधि। नेत्रभ्रूमुखरागाद्य: कर्त्तव्य व्यञ्जिता बुधै: ।। ना. शा. ९/१६४ हस्त प्रचारों को प्रयोग के समय शास्त्र निदर्शित विधि के साथ नेत्र, भौंहे, मुखराग आदि द्वारा विद्वत व्यक्त करें। यत्र व्यग्रा वु भौ हस्तो तत्तद दृष्टि विलोकनै: । वाचिकाभिनयं कुर्याद विरामेरर्थ दर्शकै: ।। ना. शा. ९/१७४ वाचिक अभिनय के समय विभिन्न दृष्टियों तथा अवलोकन क्रियाओं को हस्त क्रियाओं के अनुसार इस प्रकार दक्षता पूर्वक निदर्शित करना चाहिये जिससे कि उनके द्वारा प्रदर्शित वाचिक अभिनय विराम होने पर भी अर्थों की (पूर्ण) अभिव्यक्ति हो। पाद योर नुगौ चापि हस्तौ कार्यो प्रयोकतृभि:। ना.शा. १३/४४ यतो हस्त स्ततो दृष्टिर्य तो दृष्टि स्ततो मनः। यतो मन स्ततो भावो यतो भाव स्ततो रसः।। अ. द. ३७ पैरों की गति का हाथों द्वारा अनुशरण होना चाहिए। जिधर हाथ हो दृष्टि उसका अनुशरण करे। दृष्टि पर मन हो। जहाँ मन हो वहीं भाव और जहाँ भाव वहीं रस। नाट्यशास्त्र || अभिनयदर्पण